एक मिनट में जिंदगी नहीं बदलती पर एक मिनट में लिया गया फैसला पूरी जिंदगी बदल देतो है। - अज्ञात



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एक दिन में तीन से सेक्‍स करते थे ओशो
05/18/2013 03:51PM

नई दिल्ली. अपनी मौत के दो दशकों बाद भी आध्यात्मिक गुरु और दार्शनिक ओशो का विवादों से नाता खत्म नहीं हुआ है। ओशो के साथ लंबे समय तक रहीं उनकी पूर्व सचिव मां आनंद शीला ने ओशो पर गंभीर आरोप लगाए हैं। आनंद शीला ने अपनी किताब 'डोंट किल हिम' में बताया है कि ओशो ने किस तरह से अपनी अटेंडेंट क्रिस्टीन वूल्फ के साथ लंबे समय तक जिस्मानी रिश्ते बनाए थे। शीला के मुताबिक क्रिस्टीन ब्रिटिश नागरिक थी, जिसे ओशो ने 'विवेक' नाम दिया था। शीला की किताब के मुताबिक, 'जब विवेक ओशो से गर्भवती हो गई तो ओशो ने उसका गर्भपात करवा दिया और नसबंदी भी करवा दी थी। ओशो को सबक सिखाने के लिए विवेक बच्चे को जन्म देना चाहती थी। जब ओशो ने पुणे में अपने आश्रम की स्थापना की तो वहां गर्भपात और नसबंदी को खुला बढ़ावा दिया, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनकी सीमित जमीन पर अनगिनत बच्चे जन्म लें। ओशो का इस बात पर कितना जोर था, इसका पता इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने आश्रम के सभी अहम पदाधिकारियों को नसबंदी करवाने की हिदायत दी थी।' आनंद शीला ने एक इंटरव्यू में माना है कि कई बार ओशो एक दिन में ही अपने आश्रम की तीन अलग-अलग संन्यासिनों के साथ सेक्स करते थे। ड्रग्स लेने के लिए फर्जी मेडिकल रिपोर्ट करवाई थी तैयार! पहले चंद्रमोहन जैन फिर आचार्य रजनीश, बाद में भगवान रजनीश और अंत में ओशो के नाम से मशहूर हुए विवादित गुरु ड्रग्स भी लेते थे। ओशो की सचिव रहीं शीला ने अपनी किताब 'डोंट किल हिम' में लिखा है कि ओशो को ड्रग्स की लत इतनी जबर्दस्त लत थी कि उन्होंने 15 काल्पनिक (फर्जी) मेडिकल फाइलें बनवाई हुई थीं। इनकी मदद से ओशो वेलियम और मेप्रोबेमेट जैसे नशीले पदार्थ हासिल कर उनका सेवन करते थे। ओशो की पूर्व सचिव आनंद शीला की किताब 'डोंट किल हिम' के मुताबिक ओशो ने ग्रुप थेरेपी का कॉन्सेप्ट दिया। ओशो ने दावा किया कि ग्रुप थेरेपी गुस्से, नफरत और यौन कुंठा से निजात दिलाती है। इस थेरेपी के चलते उनके अनुयायियों की तादाद तेजी से बढ़ी और इसके साथ ही उनकी दौलत भी। ऐसी ही थेरेपी के दौरान आश्रम में हिंसा और यौन दुराचार के कई मामले भी हुए। ऐसी थेरेपी में हिस्सा लेने और आश्रम में रहने के लिए फीस इतनी ज्यादा थी कि कई संन्यासिनों ने वेश्यावृत्ति का काम शुरू कर दिया। शीला ने इस बारे में किताब में लिखा है, 'ज्ञान पाने, अहम् से छुटकारे और ध्यान के लिए आश्रम में हर कोई इतना बेकरार था, उसके लिए कुछ भी किया जा सकता था। थेरेपी में हिस्सा लेने के लिए संन्यासिनों और संन्यासियों ने अपनी जेबें खाली कर दीं और अपनी भक्ति साबित करने के लिए महंगे से महंगा तोहफा दिया। यह भगवान (ओशो) द्वारा किया गया बेहद घिनौना, नफरत पैदा करने वाला शोषण था।' ओशो के साथ लंबे समय तक रहीं आनंद शीला की किताब 'डोंट किल हिम' के मुताबिक जब ओशो की लोकप्रियता अपने चरम पर थी और बड़ी तादाद में विदेशी पुणे में मौजूद उनके आश्रम में पहुंचने लगे तो ओशो ने भारतीय अनुयायियों से पीछा छुड़ाने के लिए हिंदी छोड़कर अंग्रेजी में ज्यादा बोलना शुरू कर दिया। इसके अलावा अपने व्याख्यान सुनने की फीस भी बढ़ा दी।

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